(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.236. अध्यायः 236
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
प्रियोक्तिभिर्द्रौपदीं परिसान्त्वितवत्या सत्यभामया सह श्रीकृष्णेन स्वपुरंप्रति गमनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-236-0x(2585)(25232)
मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैः पाण्डवैश्च महात्मभिः।
कथाभिरनुकूलाभिः सह स्तित्वा जनार्दनः ॥ 3-236-1(25233)
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः।
आरुरुक्षू रथं सत्यामाह्वयामास भारत ॥ 3-236-2(25234)
सत्यभामा ततस्तत्र स्वजित्वा द्रुपदात्मजाम्।
उवाच वचनं हृद्यं यथाभावं समाहितम् ॥ 3-236-3(25235)
कृष्णे माभूत्तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः।
भर्तृभिर्देवसंकाशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ॥ 3-236-4(25236)
न ह्येवं शीलसंपन्ना नैवं पूजितलक्षणाः।
प्राप्नुवन्ति चिरं क्लेशं यथा त्वमसितेक्षणे ॥ 3-236-5(25237)
अवश्यं च त्वया भूमिरियं निहतकण्टका।
भर्तृभिः सहभोक्तव्या निर्द्वन्द्वेति श्रुतं मया ॥ 3-236-6(25238)
धार्तराष्ट्रवधं कृत्वावैराणि प्तियात्य च।
युधिष्ठिरस्थां पृथिवीं द्रष्टासि द्रुपदात्मजे ॥ 3-236-7(25239)
यास्ताः प्रव्राजपानां त्वां प्राहसन्दर्पमोहिताः।
ताः क्षिप्रं हतसंकल्पा द्रक्ष्यसि त्वं कुरुस्त्रियः ॥ 3-236-8(25240)
तव दुःखोपपन्नाया यैराचरितमप्रियम्।
विद्धि संप्रस्थितान्सर्वांस्तान्कृष्णे यमसादनम् ॥ 3-236-9(25241)
पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथाविधः।
श्रुतकर्माऽर्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः ॥ 3-236-10(25242)
सहदेवाच्च यो जातः श्रुतसेनस्तवात्मजः।
सर्वेकुशलिनो वीराः कृतास्त्राश्च सुतास्तव ॥ 3-236-11(25243)
अभिमन्युरिव प्रीता द्वारवत्यां रता भृशम्।
त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता ॥ 3-236-12(25244)
प्रीयते तव निर्द्वन्द्वा तेभ्यश्च विगतज्वरा।
दुःखिता तेन दुःखेन सुखेन सुखिता तथा ॥ 3-236-13(25245)
भजेत्सर्वात्मना चैव प्रद्युम्नजननी तथा।
भानुप्रभृतिभिश्चैनान्विशिनष्टि च केशवः ॥ 3-236-14(25246)
भोजनाच्छादने चैषां नित्यं मे श्वशुरः स्थितः।
रामप्रभृतयः सर्वे भजन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ 3-236-15(25247)
तुल्यो हिप्रणयस्तेषां प्रद्युम्नस्य च भामिनि।
एवमादि प्रियं सत्यंहृद्यमुक्त्वा मनोनुगम् ॥ 3-236-16(25248)
गमनाय मनश्चक्रेवासुदेवरथं प्रति।
तां कृष्णां कृष्णमहिषी चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ 3-236-17(25249)
आरुरोह रथं शौरेः सत्यभामाऽथ भामिनी।
स्मयित्वातु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च।
उपावर्त्य ततः शीघ्रैर्हयैः प्रायात्परंतपः ॥ 3-236-18(25250)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 236 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-236-2 संविदं संभाषाम् ॥ 3-236-3 स्वजित्वा आश्लिष्य ॥ 3-236-4 कृष्णे हेद्रौपदि ॥ 3-236-6 निर्द्वन्द्वा निष्प्रतिपक्षा ॥ 3-236-16 प्रणयः स्नेहः ॥ 3-236-18 उपावर्त्य पाण्डवनिति शेषः ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.